बचपन का सच 

जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
अच्छा ना लगता था जब खाना मुझे, मुंह से बाहर फ़ेंक देती थी
अब स्वाद लिए बिना खा कर, “अच्छा ही बना है” कह देती हूँ

क्योंकि जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
कोई मन को ना भाता था, तो मुंह सिकोड़ के मोड़ लेती थी
अब कमरे में सामने बैठ कर बात करती हूँ और मुस्कुरा भी देती हूँ

क्योंकि जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
जब लगता था कोई अच्छा, तो दौड़ के गोद में बैठ जाती थी
अब प्यार भी मन में दबा लेती हूँ, चुप ही रह जाती हूँ

क्योंकि जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
जब समझाता था कोई दुनिया भर की बातें, एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती थी
अब सुनती हूँ, पूछती हूँ, और दुनियादारी समझ के अक्सर मान भी जाती हूँ

क्योंकि जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
दर्द होता था जब कहीं मुझे, रो देती थी और माँ को पुकार लेती थी
अब आंसू पोंछ लेती हूँ और अपने काम में ध्यान लगा लेती हूँ

क्योंकि जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
अब बड़ी जो हो गयी हूँ तो मौके सा बर्ताव करती हूँ