मेरे जज़्बात- कुछ अल्फ़ाज़

कुछ लफ़्ज़ों में लिख लिया करता हूँ, जब तेरी याद आती है

अपने आँसू खुद ही पोंछ लिया करता हूँ, जब तेरी याद आती है

I write a few words, when I remember you
I wipe my own tears, when I remember you

मैं अक्सर जज़्बाती हो जाया करता हूँ 

तेरा ज़िक्र मुझे मेरी तन्हाई की याद दिला जाता है 

लम्हे, अक्सर तेरी कुछ बातें मेरे ज़ेहन में कौंधती रहती हैं 

इशारे, तेरी छुअन, तेरी हथेलियों की नमी 

सब भाग के आ जाती हैं 

और बैठ जाती हैं मेरी पुरानी कुर्सी के साथ, 

नहीं तो पलंग पर रखे सफ़ेद सिरहाने के पास 

कभी कहीं कोई तस्वीर तेरी, धकेल देती है मुझे 

पीछे 

कभी बहुत दूर 

तेरी मुस्कराहट, होठों की लाली, तेरी एक लट 

और घुंघराले बालों की भीनी भीनी खुशबू 

एक जादू सा है या एक नशा है अपने आप में 

वक़्त ये सच है या वो एक सपना था, पूछता हूँ खुद से 

जिस चाँद की रोशनी में तुझे ताका करता था 

वो भी अजनबियों जैसा बर्ताव करती है 

या तो सब वैसा ही है 

बस मैं ही बदला हूँ शायद 

जो मैं अक्सर जज़्बाती हो जाया करता हूँ 

इन छोटी छोटी बातों को ले कर!!!

मेरा जूनून 

मेरी ज़िद समझ लो या मेरी बेअदबी,
मैंने हर बात ही जूनून में की है!!
फिर चाहे वो इश्क़ था या थी ढिठाई मेरी,
मैंने हर बात ही जूनून में की है!!

मुझमें जूनून था 

जूनून था पाने का 

अपनी कामयाबी का 

अपनी काबिलियत का 

जब सब खो दिया तो समझ आया जूनून ही गलत था मेरा 

मुझमें जूनून था

जूनून था बढ़ने का 

शिखर पे चढ़ने का 

आगे दौड़ने का 

क़दम लड़खड़ाए तो पाया जूनून ही गलत था मेरा 

मुझमें जूनून था 

जूनून था इश्क़ का 

तेरी मोहब्बत का

तेरी सोहबत का 

तेरी बेवफाई ने बताया जूनून ही गलत था मेरा 

मुझमें जूनून था 

जूनून था कुछ करने का और कुछ ना करने का 

गलत से लड़ने का और सच के लिए अड़ने का 

मुसीबत में हसने का और ख़ुशी के रोने का 

फ़रेब की सच्चाईओं ने बताया जूनून ही गलत था मेरा 

एक लम्हा या फिर एक अरसा 

अंतर जीवन के एक लम्हे का दूसरे लम्हे से- अंतराल एक लम्हे से ज़्यादा का

ज़िन्दगी दौड़ती एक पटरी पर सालों से 

बदल गयी चाल उसकी जब एक लम्हे में

जादू ने बदल दिए चेहरे और उनके नक़ाब 

कोयले से हुए हीरे और मिट्टी से रकाब

एक लम्हा जो था यहाँ वो रहा ना आस पास 

जीती जाती ज़िन्दगी और अब रही ना बाकि एक सांस

एक लम्हा था सूरज आसमान में चढ़ता हुआ 

और उधर चाँद पूर्णिमा की और बढ़ता हुआ 

एक लम्हा ज़िन्दगी खुशियों को परवान हुई 

वहीँ आँगन में किलकारियाँ वीरान हुई

एक लम्हा जो एकटक देख रहे थे उसकी ओर 

वही आँखें खोज रही भरी दुनिया में अपना छोर 

एक लम्हा था सपने छू रहे थे आसमानों के शिखर 

टूटा हौंसला तो रेत के आशियाँ गए मिट्टी में बिखर 

ना था एक लम्हा जो था दुनिया बदल देने वाला 

सफर था यह लंबा, था लंबा उसका क़ाफ़िला 

बचपन का सच 

जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
अच्छा ना लगता था जब खाना मुझे, मुंह से बाहर फ़ेंक देती थी
अब स्वाद लिए बिना खा कर, “अच्छा ही बना है” कह देती हूँ

क्योंकि जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
कोई मन को ना भाता था, तो मुंह सिकोड़ के मोड़ लेती थी
अब कमरे में सामने बैठ कर बात करती हूँ और मुस्कुरा भी देती हूँ

क्योंकि जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
जब लगता था कोई अच्छा, तो दौड़ के गोद में बैठ जाती थी
अब प्यार भी मन में दबा लेती हूँ, चुप ही रह जाती हूँ

क्योंकि जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
जब समझाता था कोई दुनिया भर की बातें, एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती थी
अब सुनती हूँ, पूछती हूँ, और दुनियादारी समझ के अक्सर मान भी जाती हूँ

क्योंकि जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
दर्द होता था जब कहीं मुझे, रो देती थी और माँ को पुकार लेती थी
अब आंसू पोंछ लेती हूँ और अपने काम में ध्यान लगा लेती हूँ

क्योंकि जब मैं बच्ची थी तब मैं सच्ची थी
अब बड़ी जो हो गयी हूँ तो मौके सा बर्ताव करती हूँ

A Delusion!!

I’m dreaming of something,

     Something, 

              that is,

                   may be,

                        just impossible.
Running after it,

       Chasing it,

               mindlessly.
I did not look,

       At Broken Hearts,

                or may be Surprises.
I was busy,

        waiting,

              for the guy,

                    who would come,

Happiness,

        he would bring.
I did not realize,

       that, 

            he might be waiting,

                 as well,
for his happiness,

      for his girl,

            for his dream!!!!

Taken from an old Blog Post: Delusion Friday 22 Oct 2010

I regret I died!!

If I had few more years, what would I not do to see the wedding of my son?
I remember that, right in front of my eyes, I saw it all!!
I was a chain smoker once, but that was when I was young.
I would smoke up cigarettes, and light up those evenings with my liveliness.
I would write and then I penned a book, but that was when I was young
Then I knew I would get an award and my name would appear in leading dailies
Everyone would cheer me up and I would smile, but that was when I was young
I would plan my retirement with my grandchildren and my wife, by my side
And I saw, all those dream shattering and hopes getting killed
On that bed in emergency, in a world where everything was white but my lungs
I saw my son running door to door, from one corridor to another
Asking explanations from doctors, wanting to know the reason
My son did not sign up for this when he grew up as that smart young man- as witty, as lively
My boy wasn’t aware what future held for him when he went to college
But then, even I didn’t know what was planned for me
For I was busy, smoking up my life and lighting up those cigarettes!!
This is based on my view of what my friend went through. Dedicated to uncle! May you RIP. 

Chaotic mind of a lover girl

Daily Post https://dailypost.wordpress.com/prompts/chaotic/

This is an extempore use of the Prompt word of the Daily post Chaotic:

As she woke up every morning by his side, 

Puffed eyes, bleeding lips and tears to hide. 

Bold independent chirpy full of life,

Love, togetherness, belongingness for the strife.

A tomboy fearless carefree bird that flew high,

To a coy loving partner that she would constantly try.

Happy go lucky, eyes that shine so bright, 

Gleaming tear drops, sadness in her heart she would fight. 

The battle of right and wrong, world and herself, love and hate,

Betrayal and loyalty, chaotic endings of one sided love story, by fate.