तू है के नहीं 

कभी कभी यूँ ही, बस यूँ ही 

चलते चलते आगे चला जाता हूँ 

शायद तेरे कभी होने का अहसास नहीं भूला हूँ 

तू वहीं तो बैठती थी, उस छोर पे 

मेरे इंतज़ार में, 

    कि मैं आऊंगा 

        और सहलाऊंगा 

            तेरी रेशमी ज़ुल्फ़ों को 

                जब हवा बिखेर देगी 

                    उन्हें चेहरे पर 

                        और उन्हीं में से एक आ टिकेगी 

                            तेरे लाल होठों को छूती हुई 

                                तेरे गोरे गालों पर 

और मैं तुझे छूने के बहाने 

    झुँझलाउँगा उस पर 

        और कभी हवा पर 

            और फिर मुस्कुराऊंगा 

               तुझे देख कर 

                   तेरा हाथ पकड़ कर 

                       बेफिक्री की हसीं में खो जाऊंगा 

                           उस नीली चादर के तले 

                               बस तुझे निहारूँगा 

फिर जब सूरज ढलेगा 

    तो बदलते रंगों को देखूंगा 

        तेरी आँखों के कोने से 

             कभी उस अश्क़ में 

                 जो अपनी चुनरी के कोने से छुपाएगी 

                     कभी तेरे रश्क़ में 

                         जब तू गुस्सा होगी 

और फिर पानी में परछाईं की तरह 

    या फिर पूर्णिमा की चांदनी की तरह 

         कभी उदासी में तो कभी बेबाक हसीं में 

             कभी तू मुझ में और मैं कभी तुझ में 

                 तू वहीँ तो बैठी होगी, उस छोर पे 

कभी कभी बस यूँ ही, चलते चलते 

आगे चला जाता हूँ 

और ढूंढता हूँ तुझे अपने सपने में 

बंद आँखों से 

क्योंकि तू वहीँ तो बैठती थी!! 

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सपने की हकीकत- इक मर्ज़

तू मेरा सपना ही अच्छा है, हकीकत ना बन जाना

मुश्किल हो जायेगा , मेरा इस चाहत को संभाल पाना

सपनों की तश्तरी ज़िन्दगी के मेज़ पर सजी है

पलकों की चादर तेरे ही इंतज़ार में बिछी है

चाहत से बढ़ के यूँ आगे, थामा हाथ मैंने जो तेरा

हस्ती मिट गयी, नाम भी खो गया मेरा

बन के एक उस अँधेरी रात के साये में

तारे बन गए सपने जो मैंने सजाये थे

रुक के, पलट के, इंतज़ार था तेरे आने का

लम्हे बढ़ गए, इंतज़ार था इन सालों के बीत जाने का

डूब के तेरी चाहत में ऐसी गुस्ताखी कर बैठे

अमावस की रात में पूर्णिमा की चांदनी का इंतज़ार कर बैठे

अजनबियों सा अपनापन

जब कोई अजनबी हो के भी अपना लगे
जब सच्चाई भी एक सपना लगे

कब था तू अजनबी, कब अपना हो गया

तू मेरे आसमां का जो इक सपना हो गया

चंद पल ख़ामोशी के, चंद लम्हात तेरी बातों के

समेटे कुछ आँखों में और कुछ दबा लिए दिल में

अपने कुछ गहरे राज़ आ गए जो यूँ ही लबों पे

चुरा लिए थे जो अश्क़ कुछेक तेरी पलकों से

कुछ तुमने कहा कुछ साँसें बता गयी थी

मीलों की ये दूरी पास ही तो ला गयी थी

ना कभी कुछ अच्छा लगा था ना था भरोसा मुझे

फिर तू क्यों लगा एक ही पल में अपना मुझे

जाने कैसा रिश्ता था यह, जाने क्या था यह अहसास

तेरे अलफ़ाज़ लगे अपने ही और तू हुआ एक सांस

अनकही सी यह कहानी कुछ दिनों की या चंद घंटों की

पुरानी ऐसे जैसे चलती हो कुछ दशकों सी

ऐसा क्या यह जादू एकतरफा हो गया

कब था तू अजनबी, कब अपना हो गया!!

मेरी उम्मीद

कुछ अधूरा सा है,
कुछ खोया खोया सा जीवन,
सोए हुए हम,
ख्वाब टूटे पड़े हैं

आधी अधूरी ज़िंदगी,
बिखरे से यह लम्हे,
तन्हा, अकेले, रुके से,
इन पगडंडियों पे चल रहे हैं

यह दिल की धड़कन,
यह मन की बेचैनी,
यह उदासी, वो हँसी,
तुम्हे ढूँढ रही है

यह रास्ते, यह वास्ते,
वो इरादे, सारे वादे,
वो बातें, अंधेरी रातें,
सब, कुछ अधूरी सी हैं

यह खामोश पल,
उन में गुमसुम से
उस पनाह को तलाशते हुए,
पागलों से घूम रहे हैं

कहीं हो तुम इन सब में,
उन सपनों में जो रातों को देखा करते हैं,
उन रास्तों पे जिनपे चला करते हैं,
मेरी उम्मीदों में, मेरे लफ़्ज़ों में,

रास्ता दिखाते हुए,
मिलोगे तुम,
मिलते रहेंगे, यूँ ही,
इसी तरह,
इस ख्वाब को पूरा करने के लिए

पुरानी यादों की दस्तक

फिर ले आया दिल खोल के वो बंद हो गया पन्ना
किसी किताब के बीच में मोड़ के रखा था दुबारा खोल के देखने के लिए
यादों कि चुटकी बिखेर गया नीरस से जीवन में
पतझड़ के पेड़ों के बीच में जैसे फूलों सी महक बिखेरते हुए
उस किताब पे सिर रख के सो गए थे गहरी नींद
ऐसा लगा जैसे सपनो कि दुनिया में भूल ही गए हक़ीक़त को बदलते हुए
वो बंद पड़ी अलमारियाँ यकायक खुलने लगी जैसे अपने आप
जादू के लम्हे की तरह हम कुछ पीछे चले गए अचनचेत से
कल के अँधेरे में डर सा लगता है और आराम भी मिलता है अजीब सा
हिम्मत बता नहीं पा रही है कि और चल पायेगी मेरे संग
उम्मीद के चिराग में बढ़ते जा रहे हैं रास्ते को खोजते
लगता है कभी पुरानी सड़क पे जा के खुलेंगी ये गलियां
उन गलियों में पुराने लोगों के बीच उन्ही लम्हों में
जहाँ रंग खूबसूरत थे और बातें सपनो की होती थी
आसमान में उड़ने की ख्वाहिशें अपने पंख फड़फड़ाती हुई
भूल जाती थी कि उड़ने वाले गिर के ही ज़मीन पे वापिस आते हैं

An old letter from 26/12/2013

मेरे जज़्बात- कुछ अल्फ़ाज़

कुछ लफ़्ज़ों में लिख लिया करता हूँ, जब तेरी याद आती है

अपने आँसू खुद ही पोंछ लिया करता हूँ, जब तेरी याद आती है

I write a few words, when I remember you
I wipe my own tears, when I remember you

मैं अक्सर जज़्बाती हो जाया करता हूँ 

तेरा ज़िक्र मुझे मेरी तन्हाई की याद दिला जाता है 

लम्हे, अक्सर तेरी कुछ बातें मेरे ज़ेहन में कौंधती रहती हैं 

इशारे, तेरी छुअन, तेरी हथेलियों की नमी 

सब भाग के आ जाती हैं 

और बैठ जाती हैं मेरी पुरानी कुर्सी के साथ, 

नहीं तो पलंग पर रखे सफ़ेद सिरहाने के पास 

कभी कहीं कोई तस्वीर तेरी, धकेल देती है मुझे 

पीछे 

कभी बहुत दूर 

तेरी मुस्कराहट, होठों की लाली, तेरी एक लट 

और घुंघराले बालों की भीनी भीनी खुशबू 

एक जादू सा है या एक नशा है अपने आप में 

वक़्त ये सच है या वो एक सपना था, पूछता हूँ खुद से 

जिस चाँद की रोशनी में तुझे ताका करता था 

वो भी अजनबियों जैसा बर्ताव करती है 

या तो सब वैसा ही है 

बस मैं ही बदला हूँ शायद 

जो मैं अक्सर जज़्बाती हो जाया करता हूँ 

इन छोटी छोटी बातों को ले कर!!!

मेरा जूनून 

मेरी ज़िद समझ लो या मेरी बेअदबी,
मैंने हर बात ही जूनून में की है!!
फिर चाहे वो इश्क़ था या थी ढिठाई मेरी,
मैंने हर बात ही जूनून में की है!!

मुझमें जूनून था 

जूनून था पाने का 

अपनी कामयाबी का 

अपनी काबिलियत का 

जब सब खो दिया तो समझ आया जूनून ही गलत था मेरा 

मुझमें जूनून था

जूनून था बढ़ने का 

शिखर पे चढ़ने का 

आगे दौड़ने का 

क़दम लड़खड़ाए तो पाया जूनून ही गलत था मेरा 

मुझमें जूनून था 

जूनून था इश्क़ का 

तेरी मोहब्बत का

तेरी सोहबत का 

तेरी बेवफाई ने बताया जूनून ही गलत था मेरा 

मुझमें जूनून था 

जूनून था कुछ करने का और कुछ ना करने का 

गलत से लड़ने का और सच के लिए अड़ने का 

मुसीबत में हसने का और ख़ुशी के रोने का 

फ़रेब की सच्चाईओं ने बताया जूनून ही गलत था मेरा