ओझल हो जाएँगे

  कहा था तुमसे, एक दिन यूँ ही बातों बातों में, समंदर के किनारे जब बैठ के देख रहे थे आती जाती लहरों को   आएँगे कभी चुपके से देखेंगे तुझे दूर से और लौट जाएँगे तुझसे ना कहेंगे ना बतलाएँगे कन्नी से देखेंगे अपनी और यूँ ओझल हो जाएँगे   अगर कभी ढुंढोगे ना […]

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कहा था तुमसे, एक दिन

यूँ ही बातों बातों में, समंदर के किनारे

जब बैठ के देख रहे थे आती जाती लहरों को

आएँगे कभी चुपके से

देखेंगे तुझे दूर से

और लौट जाएँगे

तुझसे ना कहेंगे

ना बतलाएँगे

कन्नी से देखेंगे अपनी

और यूँ ओझल हो जाएँगे

अगर कभी ढुंढोगे

ना मिलेंगे

ना ही मिल पाएँगे

आँख के कोने से कभी अगर बहा एक अश्क

पोंछ के उसे ज़रा मुस्कुराएँगे

समझ जाएँगे

हर कहानी के मुकाम मे

अपना फलसफा गुनगुनाएँगे

ना समझा कोई ना समझेगा

अधूरेपन मे ही इसे पूरा कर जाएँगे

और जब एक दिन रुखसत मे दिल से बुलाएगा

तुझे हम बड़ा याद आएँगे

बस यूँ ही हम तुझे सताएँगे

और फिर बस यूँ ही ओझल हो जाएँगे

वक़्त मिला तो सोचेंगे 

कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे, इश्क़ समझ आये ना आये
तू क्यों है ऐसा जैसा तू है, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे

क्यों हुई मोहब्बत हमें, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे

अधूरे लफ़्ज़ों के वो टूटे बंधन, बिन बोले आँखों से तेरा कुछ कह जाना

क्या कशिश थी तेरे दीदार भर में, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे

लम्हे तन्हाई के भी अच्छे लगते थे, इंतज़ार की घड़ियाँ बस यूँ ही बिता देना

क्या नशा था वो एक लम्हे की मुलाक़ात में, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे

अच्छा लगता था तुझसे बातें करना, तेरे इक इक अलफ़ाज़ पे जान निसार करना

क्या जादू था तेरे लबों की एक मुस्कराहट में,

कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे जाग के रात को निहारना,

सपनों में ही तुझे पा जाना क्या ख़ुशी थी तेरे हो जाने में,

कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे क्यों तू अच्छा लगता है,

कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे

तू है के नहीं 

कभी कभी यूँ ही, बस यूँ ही

चलते चलते आगे चला जाता हूँ

शायद तेरे कभी होने का अहसास नहीं भूला हूँ

तू वहीं तो बैठती थी, उस छोर पे

मेरे इंतज़ार में,

कि मैं आऊंगा

और सहलाऊंगा

तेरी रेशमी ज़ुल्फ़ों को

जब हवा बिखेर देगी

उन्हें चेहरे पर

और उन्हीं में से एक आ टिकेगी

तेरे लाल होठों को छूती हुई

तेरे गोरे गालों पर

और मैं तुझे छूने के बहाने

झुँझलाउँगा उस पर

और कभी हवा पर

और फिर मुस्कुराऊंगा

तुझे देख कर

तेरा हाथ पकड़ कर

बेफिक्री की हसीं में खो जाऊंगा

उस नीली चादर के तले

बस तुझे निहारूँगा

फिर जब सूरज ढलेगा

तो बदलते रंगों को देखूंगा

तेरी आँखों के कोने से

कभी उस अश्क़ में

जो अपनी चुनरी के कोने से छुपाएगी

कभी तेरे रश्क़ में

जब तू गुस्सा होगी

और फिर पानी में परछाईं की तरह

या फिर पूर्णिमा की चांदनी की तरह 

कभी उदासी में तो कभी बेबाक हसीं में 

       
 
कभी तू मुझ में और मैं कभी तुझ में            
     
तू वहीँ तो बैठी होगी,

उस छोर पे कभी कभी बस यूँ ही,

चलते चलते आगे चला जाता हूँ और ढूंढता हूँ तुझे अपने सपने में बंद आँखों से 

क्योंकि तू वहीँ तो बैठती थी!! 

सपने की हकीकत- इक मर्ज़

तू मेरा सपना ही अच्छा है, हकीकत ना बन जाना

मुश्किल हो जायेगा , मेरा इस चाहत को संभाल पाना

सपनों की तश्तरी ज़िन्दगी के मेज़ पर सजी है

पलकों की चादर तेरे ही इंतज़ार में बिछी है

चाहत से बढ़ के यूँ आगे, थामा हाथ मैंने जो तेरा

हस्ती मिट गयी, नाम भी खो गया मेरा

बन के एक उस अँधेरी रात के साये में

तारे बन गए सपने जो मैंने सजाये थे

रुक के, पलट के, इंतज़ार था तेरेआने का लम्हे बढ़ गए,

इंतज़ार था इन सालों के बीत जाने का

डूब के तेरी चाहत में ऐसी गुस्ताखी कर बैठे

अमावस की रात में पूर्णिमा की चांदनी का इंतज़ार कर बैठे

अजनबियों सा अपनापन

जब कोई अजनबी हो के भी अपना लगे
जब सच्चाई भी एक सपना लगे

कब था तू अजनबी, कब अपना हो गया

तू मेरे आसमां का जो इक सपना हो गया

चंद पल ख़ामोशी के, चंद लम्हात तेरी बातों के

समेटे कुछ आँखों में और कुछ दबा लिए दिल में

अपने कुछ गहरे राज़ आ गए जो यूँ ही लबों पे

चुरा लिए थे जो अश्क़ कुछेक तेरी पलकों से

कुछ तुमने कहा कुछ साँसें बता गयी थी

मीलों की ये दूरी पास ही तो ला गयी थी

ना कभी कुछ अच्छा लगा था ना था भरोसा मुझे

फिर तू क्यों लगा एक ही पल में अपना मुझे

जाने कैसा रिश्ता था यह, जाने क्या था यह अहसास

तेरे अलफ़ाज़ लगे अपने ही और तू हुआ एक सांस

अनकही सी यह कहानी कुछ दिनों की या चंद घंटों की

पुरानी ऐसे जैसे चलती हो कुछ दशकों सी

ऐसा क्या यह जादू एकतरफा हो गया

कब था तू अजनबी, कब अपना हो गया!!

पुरानी यादों की दस्तक

फिर ले आया दिल खोल के वो बंद हो गया पन्ना
किसी किताब के बीच में मोड़ के रखा था दुबारा खोल के देखने के लिए
यादों कि चुटकी बिखेर गया नीरस से जीवन में
पतझड़ के पेड़ों के बीच में जैसे फूलों सी महक बिखेरते हुए
उस किताब पे सिर रख के सो गए थे गहरी नींद
ऐसा लगा जैसे सपनो कि दुनिया में भूल ही गए हक़ीक़त को बदलते हुए
वो बंद पड़ी अलमारियाँ यकायक खुलने लगी जैसे अपने आप
जादू के लम्हे की तरह हम कुछ पीछे चले गए अचनचेत से
कल के अँधेरे में डर सा लगता है और आराम भी मिलता है अजीब सा
हिम्मत बता नहीं पा रही है कि और चल पायेगी मेरे संग
उम्मीद के चिराग में बढ़ते जा रहे हैं रास्ते को खोजते
लगता है कभी पुरानी सड़क पे जा के खुलेंगी ये गलियां
उन गलियों में पुराने लोगों के बीच उन्ही लम्हों में
जहाँ रंग खूबसूरत थे और बातें सपनो की होती थी
आसमान में उड़ने की ख्वाहिशें अपने पंख फड़फड़ाती हुई
भूल जाती थी कि उड़ने वाले गिर के ही ज़मीन पे वापिस आते हैं

An old letter from 26/12/2013

A Delusion!!

I’m dreaming of something,

Something,

that is,

may be,

just impossible.
Running after it,

Chasing it,

mindlessly.
I did not look,

At Broken Hearts,

or may be Surprises.
I was busy,

waiting,

for the guy,

who would come,

Happiness,

he would bring.
I did not realize,

that,

he might be waiting,

as well,
for his happiness,

for his girl,

for his dream!!!!

Taken from an old Blog Post: Delusion Friday 22 Oct 2010