बचपन, प्यारा बचपन  

To all the kids I have, I’ve seen and I see in my life- Kaavish, Irya, Avika, Tavish, Tavisha, Tavisha, Anav, Seerat, Veeransh, Lakshit, Osheen, Chakshu, Bhavya. Your innocence inspired me to put it to words. And to the kid that my family raised up with oodles of love- me.

हाय बचपन, प्यारा बचपन  

बेरंग बचपन, और कभी रंगीन सा
ज़्यादातर मीठा, और कभी नमकीन सा 

कभी भुआ की ऊँची एड़ी के सैंडल चढ़ाता हुआ 
और कभी प्लास्टिक की गुड़िया को बाल्टी में डुबाता हुआ

आम को सफ़ेद फ्रॉक को खिलाता हुआ
कभी अपने खिलौनों को टम्बलर से पानी पिलाता हुआ

दादी की गोद में छिप जाता है कभी 
सो जाये सब तो खिलखिला जाता है तभी 

तिपहिया साइकिल पर पाँव लगाते हुए चलता है ज़मीं पर
मिट्टी में घूमते हुए उँगलियों के फूटते किनारों की नमीं पर

दौड़ते हुए गिर जाता है और रोने लगता है 
रोते रोते कभी थक कर सोने लगता है 

कभी माँ को पुकारता है, कभी चुप चाप ताकता है 
पास में कोई आये तो आँखों के कोनों से झांकता है 

कभी तुतलाता है, कभी मन को मचलाता है 
कभी आँखों में आँसू भर कर माँ को बुलाता है 

दादा के काँधे पर सो जाता है अक्सर ये
चुन्नी की साड़ी बाँध कर खिलखिलाता है ये 

घर की हर थाली में खाना खाता हुआ 
गली में हर आने जाने वाले को पुकारता हुआ 

कभी चाची के बाल खींचता है और कभी सजाता है 
कभी ईंटों के घर में गुड्डे गुड्डियों को कागज़ के कपडे पहनाता है 

अँधेरे में मोमबत्ती जला के कहानियां बनाता हुआ 
रो रो के घर को सर पे उठाता हुआ 

कभी चुप हो जाए तो सन्नाटा लगता है 
इसका हर एक हसीं का पल खुशियों का फव्वारा लगता है

चाचा का है लाडला और नानी की आँखों का तारा
इसकी नटखट बातों में ही है ख़ुशी का दारोमदार सारा 

आ तुझे लगा लूँ गले से और बिठा लूँ अपने पास 
दौड़ते दौड़ते थक जाता हूँ मिलाते हुए तुझसे अपनी सांस

खुशनुमा भीनी खुशबू और भोलापन तेरा 
नन्हे नन्हे पाँव तेरे और अजब सा अहसास तेरा 

तुझे छु लूँ, पकड़ लूँ, भींच लूँ अपनी बाहों में 
थक सा गया हूँ, ले चल मुझे फिर से उसी मासूमियत की पनाहों में 

Love ❤️, 

A. 

वक़्त मिला तो सोचेंगे 

कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे, इश्क़ समझ आये ना आये
तू क्यों है ऐसा जैसा तू है, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे

क्यों हुई मोहब्बत हमें, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे 

अधूरे लफ़्ज़ों के वो टूटे बंधन, बिन बोले आँखों से तेरा कुछ कह जाना 

क्या कशिश थी तेरे दीदार भर में, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे 

लम्हे तन्हाई के भी अच्छे लगते थे, इंतज़ार की घड़ियाँ बस यूँ ही बिता देना 

क्या नशा था वो एक लम्हे की मुलाक़ात में, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे 

अच्छा लगता था तुझसे बातें करना, तेरे इक इक अलफ़ाज़ पे जान निसार करना 

क्या जादू था तेरे लबों की एक मुस्कराहट में, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे 

जाग के रात को निहारना, सपनों में ही तुझे पा जाना 

क्या ख़ुशी थी तेरे हो जाने में, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे 

क्यों तू अच्छा लगता है, कभी वक़्त मिला तो सोचेंगे

तू है के नहीं 

कभी कभी यूँ ही, बस यूँ ही 

चलते चलते आगे चला जाता हूँ 

शायद तेरे कभी होने का अहसास नहीं भूला हूँ 

तू वहीं तो बैठती थी, उस छोर पे 

मेरे इंतज़ार में, 

    कि मैं आऊंगा 

        और सहलाऊंगा 

            तेरी रेशमी ज़ुल्फ़ों को 

                जब हवा बिखेर देगी 

                    उन्हें चेहरे पर 

                        और उन्हीं में से एक आ टिकेगी 

                            तेरे लाल होठों को छूती हुई 

                                तेरे गोरे गालों पर 

और मैं तुझे छूने के बहाने 

    झुँझलाउँगा उस पर 

        और कभी हवा पर 

            और फिर मुस्कुराऊंगा 

               तुझे देख कर 

                   तेरा हाथ पकड़ कर 

                       बेफिक्री की हसीं में खो जाऊंगा 

                           उस नीली चादर के तले 

                               बस तुझे निहारूँगा 

फिर जब सूरज ढलेगा 

    तो बदलते रंगों को देखूंगा 

        तेरी आँखों के कोने से 

             कभी उस अश्क़ में 

                 जो अपनी चुनरी के कोने से छुपाएगी 

                     कभी तेरे रश्क़ में 

                         जब तू गुस्सा होगी 

और फिर पानी में परछाईं की तरह 

    या फिर पूर्णिमा की चांदनी की तरह 

         कभी उदासी में तो कभी बेबाक हसीं में 

             कभी तू मुझ में और मैं कभी तुझ में 

                 तू वहीँ तो बैठी होगी, उस छोर पे 

कभी कभी बस यूँ ही, चलते चलते 

आगे चला जाता हूँ 

और ढूंढता हूँ तुझे अपने सपने में 

बंद आँखों से 

क्योंकि तू वहीँ तो बैठती थी!! 

मेरी उम्मीद

कुछ अधूरा सा है,
कुछ खोया खोया सा जीवन,
सोए हुए हम,
ख्वाब टूटे पड़े हैं

आधी अधूरी ज़िंदगी,
बिखरे से यह लम्हे,
तन्हा, अकेले, रुके से,
इन पगडंडियों पे चल रहे हैं

यह दिल की धड़कन,
यह मन की बेचैनी,
यह उदासी, वो हँसी,
तुम्हे ढूँढ रही है

यह रास्ते, यह वास्ते,
वो इरादे, सारे वादे,
वो बातें, अंधेरी रातें,
सब, कुछ अधूरी सी हैं

यह खामोश पल,
उन में गुमसुम से
उस पनाह को तलाशते हुए,
पागलों से घूम रहे हैं

कहीं हो तुम इन सब में,
उन सपनों में जो रातों को देखा करते हैं,
उन रास्तों पे जिनपे चला करते हैं,
मेरी उम्मीदों में, मेरे लफ़्ज़ों में,

रास्ता दिखाते हुए,
मिलोगे तुम,
मिलते रहेंगे, यूँ ही,
इसी तरह,
इस ख्वाब को पूरा करने के लिए

एक लम्हा या फिर एक अरसा 

अंतर जीवन के एक लम्हे का दूसरे लम्हे से- अंतराल एक लम्हे से ज़्यादा का

ज़िन्दगी दौड़ती एक पटरी पर सालों से 

बदल गयी चाल उसकी जब एक लम्हे में

जादू ने बदल दिए चेहरे और उनके नक़ाब 

कोयले से हुए हीरे और मिट्टी से रकाब

एक लम्हा जो था यहाँ वो रहा ना आस पास 

जीती जाती ज़िन्दगी और अब रही ना बाकि एक सांस

एक लम्हा था सूरज आसमान में चढ़ता हुआ 

और उधर चाँद पूर्णिमा की और बढ़ता हुआ 

एक लम्हा ज़िन्दगी खुशियों को परवान हुई 

वहीँ आँगन में किलकारियाँ वीरान हुई

एक लम्हा जो एकटक देख रहे थे उसकी ओर 

वही आँखें खोज रही भरी दुनिया में अपना छोर 

एक लम्हा था सपने छू रहे थे आसमानों के शिखर 

टूटा हौंसला तो रेत के आशियाँ गए मिट्टी में बिखर 

ना था एक लम्हा जो था दुनिया बदल देने वाला 

सफर था यह लंबा, था लंबा उसका क़ाफ़िला