ओझल

धूल जैसे उड़ के हर चीज़ को रेतीला कर देती है
कुछ साफ़ नहीं दिखता सब ओझल होता लगता है
ऐसे ही मन कभी चंचल हो विचलित हो
बेसुध घूमता है – पता नहीं क्या चाहता है
जैसे खोजता है कोई अपना किनारा – पहचाना सा
या तो कोई अपना – जो कंधे पे हाथ रख के सांत्वना देने वाला
शायद पुरानी राहें टटोलता है उम्मीद में की कोई पुराने मोड मिलेंगे
या कोई पुरानी यादें ही संभाल लेंगी मुझे बिखरने से
पता नहीं बस यही जानता है इसकी बेसुध हरकतें
मैं तो संभाल संभाल के थक गयी हूँ जैसे
कभी ठहराव से कभी डरा के
कभी चुप चाप तो कभी चिल्ला के
कुछ तो नया हो जाये जो बदल दे सब कुछ
या कुछ पुराना ही धूमिल कर दे इस स्मरणचित्र को
या तो अब अगर धूल ही समेट ले अपने आलिंगन में
ताकि सब ओझल हो जाये और उसमें शायद मैं और मेरा मन भी

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अपनापन

आज मेरे यहाँ से कोई आ रहा है

मेरे अपने शहर से मेरे घर से

बहुत कुछ मंगवाना है बहुत कुछ खाना है

कुछ मीठा ले आना और कुछ नमकीन भी

मेरे शहर से मेरी पसंदीदा मिठाई ले आना

वह नमकपारे और सेवइयां भी

तुम सब ले आना

हो सके तो थोड़ा शहर ही ले आना

और कुछ ना आ सके तो

थोड़ा अपनापन ले आना

ओझल हो जाएँगे

  कहा था तुमसे, एक दिन यूँ ही बातों बातों में, समंदर के किनारे जब बैठ के देख रहे थे आती जाती लहरों को   आएँगे कभी चुपके से देखेंगे तुझे दूर से और लौट जाएँगे तुझसे ना कहेंगे ना बतलाएँगे कन्नी से देखेंगे अपनी और यूँ ओझल हो जाएँगे   अगर कभी ढुंढोगे ना […]

कहा था तुमसे, एक दिन

यूँ ही बातों बातों में, समंदर के किनारे

जब बैठ के देख रहे थे आती जाती लहरों को

आएँगे कभी चुपके से

देखेंगे तुझे दूर से

और लौट जाएँगे

तुझसे ना कहेंगे

ना बतलाएँगे

कन्नी से देखेंगे अपनी

और यूँ ओझल हो जाएँगे

अगर कभी ढुंढोगे

ना मिलेंगे

ना ही मिल पाएँगे

आँख के कोने से कभी अगर बहा एक अश्क

पोंछ के उसे ज़रा मुस्कुराएँगे

समझ जाएँगे

हर कहानी के मुकाम मे

अपना फलसफा गुनगुनाएँगे

ना समझा कोई ना समझेगा

अधूरेपन मे ही इसे पूरा कर जाएँगे

और जब एक दिन रुखसत मे दिल से बुलाएगा

तुझे हम बड़ा याद आएँगे

बस यूँ ही हम तुझे सताएँगे

और फिर बस यूँ ही ओझल हो जाएँगे

बचपन, प्यारा बचपन  

To all the kids I have, I’ve seen and I see in my life- Kaavish, Irya, Avika, Tavish, Tavisha, Tavisha, Anav, Seerat, Veeransh, Lakshit, Osheen, Chakshu, Bhavya. Your innocence inspired me to put it to words. And to the kid that my family raised up with oodles of love- me.

हाय बचपन, प्यारा बचपन  

बेरंग बचपन, और कभी रंगीन सा
ज़्यादातर मीठा, और कभी नमकीन सा 

कभी भुआ की ऊँची एड़ी के सैंडल चढ़ाता हुआ 
और कभी प्लास्टिक की गुड़िया को बाल्टी में डुबाता हुआ

आम को सफ़ेद फ्रॉक को खिलाता हुआ
कभी अपने खिलौनों को टम्बलर से पानी पिलाता हुआ

दादी की गोद में छिप जाता है कभी 
सो जाये सब तो खिलखिला जाता है तभी 

तिपहिया साइकिल पर पाँव लगाते हुए चलता है ज़मीं पर
मिट्टी में घूमते हुए उँगलियों के फूटते किनारों की नमीं पर

दौड़ते हुए गिर जाता है और रोने लगता है 
रोते रोते कभी थक कर सोने लगता है 

कभी माँ को पुकारता है, कभी चुप चाप ताकता है 
पास में कोई आये तो आँखों के कोनों से झांकता है 

कभी तुतलाता है, कभी मन को मचलाता है 
कभी आँखों में आँसू भर कर माँ को बुलाता है 

दादा के काँधे पर सो जाता है अक्सर ये
चुन्नी की साड़ी बाँध कर खिलखिलाता है ये 

घर की हर थाली में खाना खाता हुआ 
गली में हर आने जाने वाले को पुकारता हुआ 

कभी चाची के बाल खींचता है और कभी सजाता है 
कभी ईंटों के घर में गुड्डे गुड्डियों को कागज़ के कपडे पहनाता है 

अँधेरे में मोमबत्ती जला के कहानियां बनाता हुआ 
रो रो के घर को सर पे उठाता हुआ 

कभी चुप हो जाए तो सन्नाटा लगता है 
इसका हर एक हसीं का पल खुशियों का फव्वारा लगता है

चाचा का है लाडला और नानी की आँखों का तारा
इसकी नटखट बातों में ही है ख़ुशी का दारोमदार सारा 

आ तुझे लगा लूँ गले से और बिठा लूँ अपने पास 
दौड़ते दौड़ते थक जाता हूँ मिलाते हुए तुझसे अपनी सांस

खुशनुमा भीनी खुशबू और भोलापन तेरा 
नन्हे नन्हे पाँव तेरे और अजब सा अहसास तेरा 

तुझे छु लूँ, पकड़ लूँ, भींच लूँ अपनी बाहों में 
थक सा गया हूँ, ले चल मुझे फिर से उसी मासूमियत की पनाहों में 

Love ❤️, 

A. 

तू है के नहीं 

कभी कभी यूँ ही, बस यूँ ही

चलते चलते आगे चला जाता हूँ

शायद तेरे कभी होने का अहसास नहीं भूला हूँ

तू वहीं तो बैठती थी, उस छोर पे

मेरे इंतज़ार में,

कि मैं आऊंगा

और सहलाऊंगा

तेरी रेशमी ज़ुल्फ़ों को

जब हवा बिखेर देगी

उन्हें चेहरे पर

और उन्हीं में से एक आ टिकेगी

तेरे लाल होठों को छूती हुई

तेरे गोरे गालों पर

और मैं तुझे छूने के बहाने

झुँझलाउँगा उस पर

और कभी हवा पर

और फिर मुस्कुराऊंगा

तुझे देख कर

तेरा हाथ पकड़ कर

बेफिक्री की हसीं में खो जाऊंगा

उस नीली चादर के तले

बस तुझे निहारूँगा

फिर जब सूरज ढलेगा

तो बदलते रंगों को देखूंगा

तेरी आँखों के कोने से

कभी उस अश्क़ में

जो अपनी चुनरी के कोने से छुपाएगी

कभी तेरे रश्क़ में

जब तू गुस्सा होगी

और फिर पानी में परछाईं की तरह

या फिर पूर्णिमा की चांदनी की तरह 

कभी उदासी में तो कभी बेबाक हसीं में 

       
 
कभी तू मुझ में और मैं कभी तुझ में            
     
तू वहीँ तो बैठी होगी,

उस छोर पे कभी कभी बस यूँ ही,

चलते चलते आगे चला जाता हूँ और ढूंढता हूँ तुझे अपने सपने में बंद आँखों से 

क्योंकि तू वहीँ तो बैठती थी!! 

सपने की हकीकत- इक मर्ज़

तू मेरा सपना ही अच्छा है, हकीकत ना बन जाना

मुश्किल हो जायेगा , मेरा इस चाहत को संभाल पाना

सपनों की तश्तरी ज़िन्दगी के मेज़ पर सजी है

पलकों की चादर तेरे ही इंतज़ार में बिछी है

चाहत से बढ़ के यूँ आगे, थामा हाथ मैंने जो तेरा

हस्ती मिट गयी, नाम भी खो गया मेरा

बन के एक उस अँधेरी रात के साये में

तारे बन गए सपने जो मैंने सजाये थे

रुक के, पलट के, इंतज़ार था तेरेआने का लम्हे बढ़ गए,

इंतज़ार था इन सालों के बीत जाने का

डूब के तेरी चाहत में ऐसी गुस्ताखी कर बैठे

अमावस की रात में पूर्णिमा की चांदनी का इंतज़ार कर बैठे

अजनबियों सा अपनापन

जब कोई अजनबी हो के भी अपना लगे
जब सच्चाई भी एक सपना लगे

कब था तू अजनबी, कब अपना हो गया

तू मेरे आसमां का जो इक सपना हो गया

चंद पल ख़ामोशी के, चंद लम्हात तेरी बातों के

समेटे कुछ आँखों में और कुछ दबा लिए दिल में

अपने कुछ गहरे राज़ आ गए जो यूँ ही लबों पे

चुरा लिए थे जो अश्क़ कुछेक तेरी पलकों से

कुछ तुमने कहा कुछ साँसें बता गयी थी

मीलों की ये दूरी पास ही तो ला गयी थी

ना कभी कुछ अच्छा लगा था ना था भरोसा मुझे

फिर तू क्यों लगा एक ही पल में अपना मुझे

जाने कैसा रिश्ता था यह, जाने क्या था यह अहसास

तेरे अलफ़ाज़ लगे अपने ही और तू हुआ एक सांस

अनकही सी यह कहानी कुछ दिनों की या चंद घंटों की

पुरानी ऐसे जैसे चलती हो कुछ दशकों सी

ऐसा क्या यह जादू एकतरफा हो गया

कब था तू अजनबी, कब अपना हो गया!!